Friday, 3 April 2015

नितीश सबसे आगे

 बिहार विधानसभा चुनाव की दहलीज पर ख़डा है. इस वजह से यहां चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी भाजपा के साथ मिलकर चुनाव ल़डी थी. लेकिन इस बार नीतीश का सीधा मुकाबला भाजपा से ही है. मतलब कल के दोस्त आज राजनीतिक दुश्मन हो गए हैं और कल के दुश्मन आज के राजनीतिक हमसफर. सही कहा जाता है कि राजनीति में कभी भी कोई रिश्ता स्थाई नहीं होता. इसका जीता-जागता उदाहरण बिहार की मौजूदा परिस्थिति के रूप में सभी के सामने है, जहां लालू और नीतीश ने भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए राजनीतिक बिसात बिछा ली है, लेकिन जनता-जनार्दन का फैसला सर्वोपरी होता है. ऐसे में चौथी दुनिया ने जनता के रुख को भांपने की कोशिश की, जहां नीतीश शुरुआती ब़ढत लेते दखाई दे रहे हैं. 
final-page-1बिहार का आगामी विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक होने वाला है. यह जटिलतम के साथ-साथ भविष्य की राजनीति का रास्ता निर्धारित करने वाला साबित होगा. विजेता कौन होगा, यह तो नतीजा आने के बाद ही पता चल पाता है, लेकिन हर कोई यही जानने के लिए उत्सुक है कि चुनाव का नतीजा आख़िर होगा क्या? बिहार में पिछले दो-तीन सालों में काफी राजनीतिक उठापटक हुई है. भाजपा-जदयू का गठबंधन टूटा, नीतीश और मोदी का राजनीतिक द्वंद्व हुआ, लालू यादव को सजा हो गई और वह फिलहाल चुनावी राजनीति से बाहर हो गए. लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया. फिर मांझी बेलगाम हो गए. जब भी वह बोलते, पार्टी औऱ सरकार की किरकिरी होती. काफी जद्दोजहद के बाद मांझी को हटाया गया. नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने. इस बीच भारतीय जनता पार्टी की चुनौती से निपटने के लिए नीतीश कुमार और लालू यादव ने एकजुट होने का फैसला किया है. विलय की प्रक्रिया जारी है. इतना उलटफेर किसी दूसरे राज्य की राजनीति में नहीं हुआ. इसलिए बिहार विधानसभा चुनाव सबसे दिलचस्प हो जाता है. बिहार में जनता का मूड क्या है? मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे कौन है? क्या भाजपा चुनाव जीत पाएगी? क्या बिहार का चुनाव भी दिल्ली की तरह होने वाला है? मांझी फैक्टर का क्या असर होगा? यदि लालू और नीतीश कुमार एक साथ चुनाव लड़ते हैं, तो क्या होगा? दोनों अलग-अलग लड़ते हैं, तो क्या होगा? बिहार में इस बार चुनाव का मुख्य मुद्दा क्या होगा? ऐसे कई सवाल हैं, जिन पर जनता की राय जानने के लिए चौथी दुनिया ने बिहार में एक सर्वे किया.
चौथी दुनिया का यह सर्वे 14 से 17 मार्च, 2015 के बीच किया गया. इस दौरान हमारी टीम राज्य के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के मतदाताओं से मिली और उनसे विभिन्न मुद्दों से जुड़े सवाल-जवाब किए. मतदाताओं के जवाबों को ही हमने अपने सर्वे के आधारभूत आंकड़ों के रूप में इस्तेमाल किया. इसके अलावा पिछले चुनावों में मतदाताओं के वोटिंग पैटर्न और चुनाव आयोग के आंकड़ों की भी मदद ली गई. सर्वे में सैंपल के लिए हमने मल्टीस्टेज स्ट्रेटीफाइड रैंडम सैंपलिंग तकनीक की मदद ली. सर्वे के दौरान हमने इस बात का खास ध्यान रखा कि राज्य के सभी हिस्सों के मतदाताओं के मिजाज को अहमियत मिले. इनमें महिलाएं, युवा, दलित, महादलित, अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और सवर्ण आदि सभी शामिल थे. इस सर्वे में हमने 122 विधानसभा क्षेत्रों में 12,200 लोगों से सवाल पूछे. सैंपल का साइज और तकनीक देखते हुए कहा जा सकता है कि यह सर्वे आम चुनावी सर्वे से ज़्यादा विश्‍वसनीय और तार्किक है. हमने काफी गहन विचार करने के बाद तय किया कि इस सर्वे में यह बताना उचित नहीं होगा कि किस पार्टी या गठबंधन को कितनी सीटें मिलेंगी. इसकी वजह यह है कि चुनाव में अभी काफी वक्त बचा है. इस सर्वे के पीछे हमारा मकसद था, बिहार की जनता का मिजाज यानी मूड का आकलन करने की कोशिश. इस सर्वे के ज़रिये हमने यह पता करने की कोशिश की है कि मूल राजनीतिक सवालों पर बिहार की जनता क्या सोच रही है. इस सर्वे में यह समझने की कोशिश की गई है कि पिछले दो सालों में हुई राजनीतिक उठापटक का जनता पर क्या असर हुआ है. यह सर्वे बिहार की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति और वर्तमान में घट रही घटनाओं पर बिहार की जनता की समग्र राय प्रस्तुत करती है.
अगर नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री न बनते, तो शायद उन्हें चुनाव में जनता के क्रोध का सामना करना पड़ता. इस सर्वे से ऐसा प्रतीत होता है कि जनता ने नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री बनने के फैसले का स्वागत किया है. वजह, इससे जनता को खासी राहत मिली है, क्योंकि यह सर्वे बताता है कि आज भी बिहार में क़ानून व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है. लोगों की आशा बंधी हुई है कि नीतीश कुमार बिहार में सुशासन कायम कर सकते हैं. यही भरोसा नीतीश कुमार को किसी भी दूसरे नेता से आगे खड़ा करता है.
चौथी दुनिया के इस सर्वे के मुताबिक, नीतीश कुमार बिहार के बेताज बादशाह हैं और उनकी किसी भी दूसरे नेता के साथ कोई प्रतियोगिता नहीं है. लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बावजूद बिहार की जनता आज भी नीतीश कुमार पर भरोसा करती है. इस सर्वे से यह साफ़-साफ पता चलता है कि बिहार के मतदाता काफी सोच-समझ कर वोट करते हैं. जनता के मूड से पता चलता है कि बिहार की हालत भी दिल्ली की तरह है. जिन लोगों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था, वे भी बिहार का नेतृत्व नीतीश कुमार को सौंपना चाहते हैं. बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यह है कि  क्या नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद त्याग कर ग़लती की? क्या जनता इसके लिए नीतीश कुमार को सजा देगी? क्या मांझी सरकार की ग़लतियों का खामियाजा नीतीश कुमार को भुगतना पड़ेगा? चौथी दुनिया के सर्वे के मुताबिक़, नीतीश कुमार के इस्ती़फे को बिहार की जनता ग़लत मानती है. अगर नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री न बनते, तो शायद उन्हें चुनाव में जनता के क्रोध का सामना करना पड़ता. इस सर्वे से ऐसा प्रतीत होता है कि जनता ने नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री बनने के फैसले का स्वागत किया है. वजह, इससे जनता को खासी राहत मिली है, क्योंकि यह सर्वे बताता है कि आज भी बिहार में क़ानून व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है. लोगों की आशा बंधी हुई है कि नीतीश कुमार बिहार में सुशासन कायम कर सकते हैं. यही भरोसा नीतीश कुमार को किसी भी दूसरे नेता से आगे खड़ा करता है.
चौथी दुनिया के सर्वे के मुताबिक, अगर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव एक हो जाते हैं यानी जनता परिवार का प्रयोग सफल हो जाता है और दोनों एक साथ, एक सिम्बल पर चुनाव लड़ते हैं, तो बिहार में भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ रोका जा सकता है. इस सर्वे में भारतीय जनता पार्टी के लिए भी एक सबक है. भारतीय जनता पार्टी में मुख्यमंत्री पद को लेकर भ्रम की स्थिति (कन्फ्यूजन) बरकरार है. पार्टी में मुख्यमंत्री पद के कई उम्मीदवार हैं. सुशील कुमार मोदी, नवल किशोर यादव, गिरिराज सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा, शाहनवाज हुसैन जैसे कई नेता हैं, जिनके नाम पर लोगों के बीच चर्चा होती है. इसी तरह के कन्फ्यूजन के चलते भारतीय जनता पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव हार गई. अरविंद केजरीवाल जैसे एक दमदार उम्मीदवार के सामने आख़िरी वक्त पर किरण बेदी को लाना भाजपा को महंगा पड़ा. अगर वैसी भ्रम की स्थिति बिहार में हुई, तो चुनाव नतीजे दिल्ली से अलग नहीं होने वाले हैं. चुनाव के वक्त जैसी लोकप्रियता केजरीवाल की दिल्ली में थी, उससे कहीं ज़्यादा नीतीश कुमार बिहार में लोकप्रिय दिखाई दे रहे हैं. इस सर्वे में हमने मतदाताओं से कुल 11 सवाल पूछे. ऐसे सवाल, जिनका सीधा असर मतदान पर होता है. चौथी दुनिया के शुरुआती सर्वे का नतीजा आपके सामने है. कुछ दिनों के बाद इन नतीजों में क्या बदलाव होता है, उसके बारे में भी हम आपको अपडेट करेंगे. अगले सर्वे में लोगों की राय के थ-साथ किस पार्टी को कितने वोट मिलेंगे और कितनी सीटें मिलेंगी, हम यह भी बताएंगे.

मुख्यमंत्री पद के लिए आपकी पहली पसंद कौन?
इस सवाल के जवाब में नीतीश कुमार पहले नंबर पर रहे. जबकि भारतीय जनता पार्टी के तीन नेताओं में सबसे अधिक वोट सुशील मोदी को मिले. इस तरह के जवाब इसलिए भी सामने आते हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से राजनीतिक दल अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार पहले ही घोषित कर देती हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण है. बिहार में नीतीश कुमार पहले भी मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार रहे हैं. इसका फ़ायदा उन्हें इस सर्वे में भी मिलता दिख रहा है. चूंकि भाजपा ने अभी तक अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, इस वजह से लोगों के सामने कोई ठोस विकल्प नहीं है. हमने इस सर्वे में भाजपा की ओर से जो तीन नाम सामने रखे, उनमें सुशील मोदी पहले, नंद किशोर यादव दूसरे और गिरिराज सिंह तीसरे नंबर पर रहे. इस सर्वे से एक बात साफ़ हुई कि जनता जीतन राम मांझी के नाम पर बिल्कुल भी तैयार नहीं दिख रही. अन्य, जिनके लिए आठ प्रतिशत लोगों ने अपना मत दिया, उनमें राबड़ी देवी, शाहनवाज हुसैन एवं राम विलास पासवान आदि शामिल हैं.

इस चुनाव का मुख्य मुद्दा क्या है?
इस सवाल के बदले मिले जवाब बताते हैं कि बिहार की जनता के लिए क़ानून व्यवस्था अभी भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है. लालू यादव के जमाने में क़ानून व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई थी. जंगलराज की बात हाईकोर्ट तक ने कही थी. अपहरण यहां का उद्योग बन गया था, जिससे आम जनता बहुत परेशान थी. नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद इसमें सुधार होता दिखा. लोगों की जेब से पैसे बाहर निकलने लगे थे. छोटी संख्या में ही सही, लेकिन लघु उद्योग, खासकर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगने लगे. लेकिन, जीतन राम मांझी के नौ महीने के कार्यकाल में क़ानून व्यवस्था की हालत फिर से गड़बड़ाने लगी. लोगों को फिर से भय सताने लगा. इस सर्वे में जिन लोगों ने भी जवाब दिया, उनका स्पष्ट मानना था कि बिहार का विकास तभी संभव है, जबकि यहां क़ानून व्यवस्था दुरुस्त रहे. लोगों ने माना कि पिछले कुछ समय से आपराधिक गतिविधियां बढ़ी हैं और एक बार फिर से रात में आवागमन मुश्किल हो गया. विकास भी यहां एक बड़ा मुद्दा है. सर्वे के दौरान लोगों ने माना कि नीतीश कुमार के शासनकाल में विकास की गति अच्छी थी, लेकिन पिछले कुछ समय से यह गति धीमी पड़ गई है. आश्‍चर्यजनक रूप से सबसे कम मत भ्रष्टाचार को मिले यानी महज 09 प्रतिशत.

आप वोट देते समय इनमें से किसे प्राथमिकता देंगे?
इस सवाल के जवाब में 43 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार देखकर अपना मतदान करेंगे. ऐसे लोगों का कहना था कि उनके पास ताजा उदाहरण हैं, नीतीश और मांझी. दोनों ही जदयू के थे, लेकिन नीतीश का कार्यकाल विकास के लिए जाना जाता है और मांझी का कार्यकाल केवल ग़लत बयानबाजी के लिए. मुख्यमंत्री अच्छा होगा, तो विकास भी होगा. 31 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वे पार्टी कोवोट करेंगे. अगर पार्टी भ्रष्ट होगी, तो फिर मुख्यमंत्री कोई भी हो, कुछ फ़़र्क नहीं पड़ता. 19 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वे उम्मीदवार देखकर मतदान करेंगे, क्योंकि वे किसी काम के लिए मुख्यमंत्री के पास तो जाएंगे नहीं. यदि उम्मीदवार सही होगा, तो उनके काम आसानी से हो जाएंगे. 07 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अन्य मुद्दों पर मतदान करेंगे. इस सवाल के बदले मिले जवाब बताते हैं कि आज भी लोग मुद्दों से कहीं ज़्यादा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को तरजीह देते हैं और उनका मानना है कि अगर मुख्यमंत्री सही होगा, तो राज्य का विकास अवश्य होगा.
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